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आचार मत - श्री श्रावकाचार जी

इस ग्रंथ में 462 गाथाएँ हैं। अव्रत सम्यक् दृष्टि के लिये यह ग्रन्थ कहा है। इसमें वैराग्य भाव जगाने के लिये संसार, शरीर, भोगों का स्वरूप बताकर, जीव के अनादि कालीन संसार में भ्रमण का कारण तथा अव्रत सम्यक्दृष्टि श्रावक और व्रती श्रावक के आचार का कथन किया है। ‘‘सार्धं न्यान मयं धुवं’’ आदि कहकर श्रावक की विशेषता दर्शाई है। श्रावक दशा के आगे साधु पद का भी संक्षिप्त स्वरूप इस ग्रन्थ में बताया गया है। निश्चय-व्यवहार के समन्वय पूर्वक श्रावक के आचरण का दिग्दर्शन कराने वाला यह अनुपम ग्रन्थ है।