मोक्षमार्गस्य नेतारं, भेत्तारं कर्मभूभृताम्।

ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां, वन्दे तद्गुणलब्धये॥

(आर्या गीतिका)

त्रैकाल्यं द्रव्य-षट्कं, नवपदसहितं, जीव-षट्काय-लेश्या:

पञ्चान्ये चास्तिकाया,व्रतसमिति-गति,-ज्ञान-चारित्र-भेदा:।



इत्येतन्मोक्षमूलं, त्रिभुवन - महितै:, प्रोक्त - मर्हद्-भिरीशै:

प्रत्येति श्रद्धधाति,स्पृशति च मतिमान् ,य: स वै शुद्धदृष्टि:॥ 1॥



सिद्धे जयप्प-सिद्धे, चउव्विहारा-हणाफलं पत्ते।

वंदित्ता अरहंते वोच्छं आराहणा कमसो॥ 2॥



उज्जोवण-मुज्जवणं,णिव्वहणं साहणं च णिच्छरणं।

दंसण-णाण चरित्तं,तवाण-माराहणा भणिया॥ 3॥



प्रथम अध्याय

सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:॥ 1॥ तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्॥2॥ तन्निसर्गादधिगमाद् वा॥3॥ जीवाजीवा-स्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्॥4॥ नाम-स्थापना-द्रव्य-भावतस्तन्न्यास:॥ 5॥ प्रमाण-नयै-रधिगम:॥ 6॥ निर्देश-स्वामित्व-साधनाधिकरण-स्थिति-विधानत:॥7॥ सत्संख्या-क्षेत्र-स्पर्शन-कालान्तर-भावाल्प-बहुत्वैश्च॥ 8॥ मति-श्रुता-वधि-मन:पर्यय-केवलानि ज्ञानम्॥ 9॥ तत्प्रमाणे॥ 10॥ आद्ये परोक्षम्॥ 11॥ प्रत्यक्ष-मन्यत्॥ 12॥ मति: स्मृति: संज्ञा चिन्ता-भिनि-बोध इत्य-नर्थान्तरम्॥ 13॥ तदिन्द्रिया-निन्द्रिय-निमित्तम्॥ 14॥ अव-ग्रहे-हावाय-धारणा:॥ 15॥ बहु-बहुविध-क्षिप्रानि:सृता-नुक्त-ध्रुवाणां सेतराणाम्॥ 16॥ अर्थस्य॥ 17॥ व्यञ्जनस्यावग्रह:॥ 18॥ न चक्षु-रनिन्द्रियाभ्याम्॥ 19॥ श्रुतं मति-पूर्वं द्व्यनेक-द्वादश-भेदम्॥20॥ भव-प्रत्ययोऽवधिर्देव-नारकाणाम्॥21॥ क्षयोपशम-निमित्त: षड्विकल्प: शेषाणाम्॥ 22॥ ऋजु-विपुलमती मन:पर्यय:॥ 23॥ विशुद्ध्य-प्रतिपाताभ्यां तद्विशेष:॥ 24॥ विशुद्धि-क्षेत्र-स्वामि-विषयेभ्योऽवधि-मन:पर्यययो: ॥ 25॥ मति-श्रुतयो-र्निबन्धो द्रव्येष्वसर्व-पर्यायेषु॥26॥ रूपिष्ववधे:॥ 27॥ तदनन्त-भागे मन:पर्ययस्य॥28॥ सर्व-द्रव्य-पर्यायेषु केवलस्य॥ 29॥ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना-चतुभ्र्य:॥ 30॥ मति-श्रुतावधयो विपर्ययश्च॥ 31॥ स-दसतो-रवि-शेषाद्यदृच्छोप-लब्धे-रुन्मत्तवत्॥ 32॥ नैगम-संग्रहव्यवहारर्जु-सूत्र-शब्द-समभि-रूढैवंभूता नया:॥ 33॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे प्रथमोऽध्याय:॥ १॥



द्वितीय अध्याय

औप-शमिक-क्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्व-मौदयिक-पारिणामिकौ च॥ 1॥ द्वि-नवाष्टा-दशैक-विंशति-त्रि-भेदा यथा-क्रमम्॥ 2॥ सम्यक्त्व-चारित्रे॥ 3॥ ज्ञान-दर्शन-दान-लाभ-भोगोप-भोग-वीर्याणि च॥ 4॥ ज्ञाना-ज्ञान-दर्शन-लब्धयश्-चतुस्त्रि-त्रि पञ्चभेदा: सम्यक्त्व-चारित्र-संयमासंयमाश्च॥ 5॥ गति-कषाय-लिङ्ग-मिथ्यादर्शना-ज्ञाना-संयता-सिद्ध-लेश्याश्-चतुश्-चतुस्त्र्ये-कैकैकैक-षड्भेदा:॥ 6॥ जीव-भव्या-भव्यत्वानि च॥ 7॥ उपयोगो लक्षणम्॥ 8॥ स द्विविधोऽष्ट-चतुर्भेद:॥ 9॥ संसारिणो मुक्ताश्च॥ 10॥ सम-नस्का-मनस्का:॥ 11॥ संसारिणस्त्रस-स्थावरा:॥12॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवन-स्पतय:स्थावरा:॥13॥द्वीन्द्रियादयस्त्रसा:॥14॥ पञ्चेन्द्रियाणि॥ 15॥ द्विविधानि ॥16॥ निर्वृत्युप-करणे द्रव्येन्द्रियम्॥17॥ लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम्॥18॥ स्पर्शन-रसन-घ्राण-चक्षु: श्रोत्राणि॥19॥स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण-शब्दास्तदर्था:॥20॥ श्रुत-मनिन्द्रियस्य॥ 21॥ वनस्पत्यन्ताना-मेकम्॥ 22॥ कृमि-पिपीलिका-भ्रमर-मनुष्यादीना-मेकैक-वृद्धानि॥ 23॥ संज्ञिन: समनस्का:॥ 24॥ विग्रहगतौ कर्म-योग: ॥ 25॥ अनुश्रेणि गति:॥ 26॥ अविग्रहा जीवस्य॥ 27॥ विग्रहवती च संसारिण: प्राक् चतुभ्र्य:॥ 28॥ एक-समया-विग्रहा॥ 29॥ एकं द्वौ त्रीन्वानाहारक:॥ 30॥ सम्मूच्र्छन-गर्भोपपादा जन्म॥ 31॥ सचित्त-शीत-संवृता सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनय:॥ 32॥ जरायु-जाण्डज-पोतानां गर्भ:॥ 33॥ देव-नारकाणा-मुपपाद:॥ 34॥ शेषाणां सम्मूच्र्छनम्॥ 35॥ औदारिक-वैक्रियिका-हारक-तैजस-कार्मणानि शरीराणि॥36॥ परं परं सूक्ष्मम्॥37॥ प्रदेशतोऽसंख्येय-गुणं प्राक् तैजसात्॥ 38॥ अनन्त-गुणे परे॥ 39॥ अप्रतीघाते॥ 40॥ अनादि-सम्बन्धे च॥ 41॥ सर्वस्य॥ 42॥ तदादीनि भाज्यानि युगप-देकस्या-चतुभ्र्य:॥ 43॥ निरुप-भोग-मन्त्यम्॥ 44॥ गर्भ-सम्मूच्र्छनजमाद्यम्॥ 45॥ औपपादिकं वैक्रियिकम्॥ 46॥ लब्धि-प्रत्ययं च॥ 47॥ तैजस-मपि॥ 48॥ शुभं विशुद्ध-मव्याघाति चाहारकं प्रमत्त-संयतस्यैव॥ 49॥ नारक-सम्मू-च्र्छिनो नपुंसकानि॥ 50॥ न देवा:॥ 51॥ शेषास्त्रिवेदा:॥ 52॥ औपपादिक-चरमोत्तम-देहा-संख्येय-वर्षा-युषोऽनप-वत्र्यायुष:॥ 53॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥



तृतीय अध्याय

रत्न-शर्करा-बालुका-पङ्क-धूम-तमो-महातम:-प्रभा-भूमयो घनाम्बु-वाता-काश-प्रतिष्ठा: सप्ता-धोऽध:॥ 1॥ तासु त्रिंशत्पञ्च-विंशति-पञ्चदश-दश-त्रि-पञ्चोनैक-नरक-शत-सहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम्॥ 2॥ नारका नित्या-शुभतर-लेश्या-परिणाम-देह-वेदना-विक्रिया:॥ 3॥ परस्परो-दीरित-दु:खा:॥ 4॥ संक्लिष्टासुरो-दीरित-दु:खाश्च प्राक्चतुथ्र्या:॥ 5॥ तेष्वेक-त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रय-स्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थिति:॥ 6॥ जम्बूद्वीप-लवणोदादय: शुभ-नामानो द्वीप-समुद्रा:॥7॥ द्वि-द्र्वि-र्विष्कम्भा: पूर्व-पूर्वपरिक्षेपिणो वलया-कृतय:॥ 8॥ तन्मध्ये मेरु-नाभि-र्वृत्तो योजन-शत-सहस्र-विष्कम्भो जम्बूद्वीप:॥9॥ भरत-हैमवत-हरि-विदेह-रम्यक-हैरण्य-वतैरा-वत-वर्षा: क्षेत्राणि॥ 10॥ तद्-विभाजिन: पूर्वा-परायता हिमवन्-महाहिमवन्-निषध-नील-रुक्मि-शिखरिणो वर्षधर-पर्वता:॥ 11॥ हेमार्जुन-तपनीय-वैडूर्य-रजत-हेममया:॥12॥ मणि-विचित्र-पाश्र्वा उपरि मूले च तुल्य-विस्तारा:॥ 13॥ पद्म-महापद्म-तिगिञ्छ-केशरि-महापुण्डरीक पुण्डरीका ह्रदास्तेषा - मुपरि ॥ 14॥ प्रथमो योजन-सहस्रायामस्तदर्ध विष्कम्भो ह्रद:॥15॥ दश-योजनावगाह:॥ 16॥ तन्मध्ये योजनं पुष्करम्॥ 17॥ तद्-द्विगुण-द्विगुणा ह्रदा: पुष्कराणि च॥ 18॥ तन्-निवासिन्यो देव्य: श्री-ह्री-धृति-कीर्ति-बुद्धि-लक्ष्म्य: पल्योपमस्थितय: ससामानिक-परिषत्का:॥19॥ गङ्गा-सिन्धु-रोहिद्रोहि-तास्या-हरिद्धरि-कान्ता-सीता-सीतोदा-नारी-नरकान्ता-सुवर्ण-रूप्यकूला-रक्तारक्तोदा: सरितस्तन्मध्यगा:॥ 20॥ द्वयोद्र्वयो: पूर्वा: पूर्वगा:॥ 21॥ शेषास्त्व-परगा:॥ 22॥ चतुर्दश-नदी-सहस्र-परिवृता गङ्गा-सिन्ध्वादयो नद्य:॥ 23॥ भरत: षड् विंशति-पञ्चयोजन-शत-विस्तार: षट्चैकोन-विंशति-भागा योजनस्य॥ 24॥ तद्द्विगुण-द्विगुण-विस्तारा वर्षधर-वर्षा विदेहान्ता:॥25॥ उत्तरा दक्षिणतुल्या:॥26॥ भरतैरावतयोर्वृद्धि-ह्रासौ षट्समयाभ्या -मुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम्॥27॥ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता:॥ 28॥एक-द्वि-त्रि-पल्योपम-स्थितयो हैमवतक-हारिवर्षक-दैव-कुरवका:॥ 29॥ तथोत्तरा: ॥ 30॥ विदेहेषु संख्येय-काला:॥ 31॥ भरतस्य विष्कम्भो जम्बू-द्वीपस्य नवति-शत-भाग:॥ 32॥ द्विर्धातकी-खण्डे॥33॥ पुष्कराद्र्धे च॥ 34॥ प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्या:॥ 35॥ आर्या म्लेच्छाश्च॥ 36॥ भरतैरावत-विदेहा: कर्म-भूमयोऽन्यत्र देव-कुरूत्तर-कुरुभ्य:॥ 37॥ नृस्थिती परावरे त्रिपल्योप-मान्तर्मुहूर्ते॥ 38॥ तिर्यग्योनिजानां च॥ 39॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥



चतुर्थ अध्याय

देवाश्चतुर्णिकाया:॥ 1॥ आदितस्-त्रिषु पीतान्त-लेश्या:॥ 2॥ दशाष्ट-पञ्च-द्वादश-विकल्पा: कल्पोपपन्न-पर्यन्ता:॥ 3॥इन्द्र-सामानिक-त्रायस्त्रिंश-पारिषदात्मरक्ष-लोक-पाला-नीक-प्रकीर्णका-भियोग्य-किल्विषिकाश्चैकश:॥ 4॥ त्रायस्त्रिंशलोक-पाल-वज्र्या व्यन्तर-ज्योतिष्का:॥ 5॥ पूर्वयोद्र्वीन्द्रा:॥6॥ काय-प्रवीचारा आ ऐशानात्॥ 7॥ शेषा: स्पर्श-रूप-शब्द-मन:प्रवीचारा:॥8॥ परेऽप्रवीचारा:॥ 9॥भवन-वासिनोऽसुरनाग-विद्युत्सुपर्णाग्नि-वातस्तनितोदधि-द्वीप- दिक्कुमारा:॥10॥ व्यन्तरा: किन्नर-किम्पुरुष-महोरग-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-भूत-पिशाचा:॥11॥ ज्योतिष्का: सूर्या - चन्द्र-मसौ ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णक-तारकाश्च॥ 12॥ मेरु-प्रदक्षिणा नित्य-गतयो नृलोके॥ 13॥ तत्कृत: काल-विभाग:॥ 14॥ बहिरवस्थिता:॥ 15॥ वैमानिका:॥ 16॥ कल्पोपपन्ना: कल्पातीताश्च॥17॥ उपर्युपरि॥18॥ सौधर्मैशान-सानत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरलान्तव-कापिष्ठ-शुक्र-महाशुक्र-शतार-सहस्रारेष्वानत-प्राणतयो-रारणा-च्युतयो र्नवसु ग्रैवेयकेषु विजय-वैजयन्त-जयन्ता-पराजितेषु सर्वार्थ-सिद्धौ च॥ 19॥ स्थिति-प्रभाव-सुख-द्युति-लेश्या-विशुद्धीन्द्रिया-वधि-विषयतोऽधिका:॥ 20॥ गति-शरीर-परिग्रहाभिमानतो हीना:॥ 21॥ पीत-पद्म-शुक्ल-लेश्या द्वि-त्रिशेषेषु॥ 22॥ प्राग्ग्रैवेयकेभ्य: कल्पा:॥ 23॥ ब्रह्म-लोकालया लौकान्तिका:॥ 24॥ सारस्वता-दित्य-वह्न्यरुण-गर्दतोय-तुषिताव्याबाधा-रिष्टाश्च॥ 25॥ विजयादिषु द्विचरमा:॥26॥ औपपादिक-मनुष्येभ्य: शेषास्तिर्यग्योनय:॥ 27॥ स्थिति-रसुर-नाग-सुपर्ण-द्वीप-शेषाणां सागरोपम-त्रिपल्योपमाद्र्ध-हीन-मिता:॥ 28॥ सौधर्मैशानयो: सागरोपमे अधिके॥ 29॥ सानत्कुमार-माहेन्द्रयो: सप्त॥ 30॥ त्रि-सप्त-नवैका-दश-त्रयोदश-पञ्चदशभि-रधिकानि तु॥ 31॥ आरणाच्युता-दूध्र्व-मेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च॥32॥ अपरा पल्योपममधिकम्॥ 33॥ परत: परत: पूर्वापूर्वानन्तरा॥ 34॥ नारकाणां च द्वितीयादिषु॥ 35॥ दश-वर्ष-सहस्राणि प्रथमायाम्॥ 36॥ भवनेषु च॥ 37॥ व्यन्तराणां च॥ 3८॥ परा पल्योपम-मधिकम्॥ 39॥ ज्योतिष्काणां च॥ 40॥ तदष्ट-भागोऽपरा॥41॥ लौकान्तिकाना-मष्टौ सागरो-पमाणि सर्वेषाम्॥ 42॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥



पञ्चम अध्याय

अजीव-काया धर्मा-धर्मा-काश-पुद्गला:॥1॥ द्रव्याणि॥ 2॥ जीवाश्च॥3॥नित्या-वस्थितान्यरूपाणि॥4॥ रूपिण: पुद्गला:॥5॥ आ आकाशा-देक-द्रव्याणि॥6॥ निष्क्रियाणि च॥ 7॥ असंख्येया: प्रदेशा धर्मा-धर्मैक-जीवानाम्॥ 8॥ आकाशस्यानन्ता:॥9॥ संख्येया-संख्येयाश्च पुद्गलानाम्॥ 10॥ नाणो:॥11॥ लोकाकाशेऽवगाह:॥12॥ धर्मा-धर्मयो: कृत्स्ने॥ 13॥ एक-प्रदेशादिषु भाज्य: पुद्गलानाम् ॥14॥ असंख्येय-भागादिषु जीवानाम्॥15॥ प्रदेश-संहार-विसर्पाभ्यां प्रदीपवत्॥16॥गति-स्थित्युपग्रहौ धर्मा-धर्मयो-रुपकार:॥17॥आकाशस्या-वगाह:॥ 18॥ शरीर-वाङ्मन: प्राणा-पाना: पुद्गलानाम्॥19॥ सुख-दु:ख-जीवित-मरणो-पग्रहाश्च॥ 20॥ परस्परोपग्रहो जीवानाम्॥ 21॥ वर्तना-परिणाम-क्रिया: परत्वापरत्वे च कालस्य॥ 22॥ स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णवन्त: पुद्गला:॥ 23॥ शब्द-बन्ध-सौक्ष्म्य-स्थौल्य-संस्थान-भेद-तमश्छाया-तपोद्योत-वन्तश्च॥ 24॥ अणव: स्कन्धाश्च॥ 25॥ भेद-संघातेभ्य: उत्पद्यन्ते॥26॥ भेदा-दणु:॥ 27॥ भेद-संघाताभ्यां चाक्षुष:॥ 28॥ सद्द्रव्य-लक्षणम्॥ 29॥ उत्पादव्ययध्रौव्य युक्तं सत्॥ 30॥ तद्भावाव्ययं नित्यम्॥ 31॥ अर्पिता-नर्पित-सिद्धे:॥ 32॥ स्निग्ध-रूक्षत्वाद् बन्ध:॥ 33॥ न जघन्य-गुणानाम्॥ 34॥ गुण-साम्ये सदृशानाम्॥ 35॥ द्व्यधिकादि-गुणानां तु॥36॥ बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च॥ 37॥ गुण-पर्ययवद् द्रव्यम्॥ 38॥ कालश्च॥ 39॥ सोऽनन्त-समय:॥ 40॥ द्रव्याश्रया निर्गुणा: गुणा:॥ 41॥ तद्भाव: परिणाम:॥ 42॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥



छठा अध्याय

काय-वाङ् -मन: कर्म योग:॥ 1॥ स आस्रव:॥ 2॥ शुभ: पुण्यस्याशुभ: पापस्य॥ 3॥ सकषाया-कषाययो: साम्परायि -केर्या-पथयो:॥ 4॥ इन्द्रिय-कषाया-व्रतक्रिया: पञ्च चतु: पञ्च-पञ्चविंशति-संख्या: पूर्वस्य भेदा:॥ 5॥ तीव्र-मन्द-ज्ञाता-ज्ञात-भावाधि-करण-वीर्य-विशेषेभ्यस्तद्विशेष:॥ 6॥ अधिकरणं जीवा-जीवा:॥ 7॥ आद्यं संरम्भ-समा-रम्भा-रम्भ-योग-कृत-कारितानु-मत-कषाय-विशेषैस्-त्रिस्-त्रिस्-त्रिश्-चतुश्चैकश:॥8॥ निर्वर्तना-निक्षेप-संयोग-निसर्गा द्वि-चतुद्र्वि-त्रि-भेदा: परम्॥ 9॥ तत्प्रदोष-निह्नव-मात्सर्यान्तराया-सादनोपघाता ज्ञान-दर्शनावरणयो: ॥ 10॥ दु:ख-शोक-तापा-क्रन्दन-वध-परिदेव-नान्यात्म - परोभय-स्थानान्य सद्वेद्यस्य॥11॥भूतव्रत्यनु-कम्पा-दान-सराग संयमादियोग: क्षान्ति: शौच-मिति सद्-वेद्यस्य॥ 12॥ केवलि-श्रुत-संघ-धर्म-देवा-वर्णवादो दर्शन-मोहस्य ॥13॥कषायो-दयात्तीव्र-परिणामश्चारित्र-मोहस्य॥ 14॥ बह्वारम्भ-परिग्रहत्वं नारकस्यायुष:॥15॥ माया तैर्यग्योनस्य ॥ 16॥ अल्पारम्भ-परिग्रहत्वं मानुषस्य॥ 17॥ स्वभाव-मार्दवं च॥ 18॥ नि: शीलव्रतत्वं च सर्वेषाम्॥ 19॥ सराग-संयम-संयमासंयमा-कामनिर्जरा-बाल-तपांसि दैवस्य॥ 20॥ सम्यक्त्वं च॥ 21॥ योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्न:॥ 22॥ तद्विपरीतं शुभस्य॥ 23॥ दर्शन-विशुद्धि-र्विनय-सम्पन्नता शील-व्रतेष्वनती-चारोऽभीक्ष्ण-ज्ञानोप-योगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधु-समाधि-र्वैया-वृत्त्य-करण-मर्हदा-चार्य बहुश्रुत-प्रवचन भक्ति-रावश्यका-परि-हाणि-र्मार्ग-प्रभावना-प्रवचन-वत्सलत्व-मिति तीर्थकर-त्वस्य॥24॥ परात्म-निन्दा-प्रशंसे स-दसद्-गुणोच्छादनोद् -भावने च नीचै र्गोत्रस्य॥ 25॥ तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य॥ 26॥ विघ्नकरणमन्तरायस्य॥ 27॥



सप्तम अध्याय

हिंसानृत-स्तेयाब्रह्म-परिग्रहेभ्यो विरतिव्र्रतम्॥ 1॥ देश-सर्वतोऽणु-महती॥ 2॥ तत्स्थैर्यार्थं भावना: पञ्च पञ्च॥ 3॥ वाङ् मनो-गुप्तीर्या-दान-निक्षेपण-समित्या-लोकित-पान-भोजनानि पञ्च॥ 4॥ क्रोध-लोभ-भीरुत्व-हास्य-प्रत्या-ख्यानान्य-नुवीचि-भाषणं च पञ्च॥ 5॥ शून्यागार-विमोचितावास-परोपरोधाकरण-भैक्ष्यशुद्धि-सधर्मा-विसंवादा: पञ्च॥ 6॥ स्त्रीरागकथाश्रवण-तन्मनोहराङ्ग-निरीक्षण-पूर्वरतानुस्मरण-वृष्येष्टरस-स्वशरीरसंस्कार-त्यागा: पञ्च॥ 7॥ मनोज्ञा-मनोज्ञेन्द्रिय-विषय-राग-द्वेष-वर्जनानि पञ्च॥8॥ हिंसा-दिष्विहामुत्रापायावद्य-दर्शनम्॥ 9॥ दु:ख-मेव वा॥ 10॥ मैत्रीप्रमोदकारुण्य-माध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिकक्लिश्य-माना-विनयेषु॥11॥ जगत्काय -स्वभावौ वा संवेग-वैराग्यार्थम्॥ 12॥ प्रमत्त-योगात्प्राण- व्यपरोपणं हिंसा॥13॥ असदभिधानमनृतम्॥ 14॥ अदत्ता-दानं स्तेयम्॥ 15॥ मैथुन-मब्रह्म॥ 16॥ मूच्र्छा परिग्रह:॥ 17॥ नि:शल्योव्रती॥18॥ अगार्यनगारश्च॥19॥ अणुव्रतोऽगारी ॥20॥ दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-प्रोषधोपवासो - पभोगपरिभोग-परिमाणा-तिथि-संविभाग-व्रत-सम्पन्नश्च ॥ 21॥ मारणांतिकीं सल्लेखनां जोषिता॥ 22॥ शङ्का-कांक्षा-विचिकित्सान्यदृष्टि-प्रशंसासंस्तवा: सम्यग्दृष्टे-रतिचारा:॥ 23॥ व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम्॥ 24॥ बन्ध-वध-च्छेदाति-भारारोपणान्न-पाननिरोधा:॥ 25॥ मिथ्योपदेश-रहोभ्याख्यान-कूट-लेख-क्रियान्यासाप-हार-साकारमन्त्र-भेदा:॥ 26॥ स्तेन-प्रयोग-तदा-हृता-दान-विरुद्ध-राज्यातिक्रमहीनाधिक-मानोन्मान-प्रतिरूपक-व्यवहारा:॥ 27॥ परविवाह-करणेत्वरिका-परिगृहीता-परिगृहीता-गमना-नङ्गक्रीडा-काम-तीव्राभिनिवेशा:॥ 28॥ क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्य-दासी-दास-कुप्य-प्रमाणातिक्रमा:॥29॥ ऊध्र्वा-धस्तिर्यग्व्यति-क्रम-क्षेत्रवृद्धि -स्मृत्यन्तराधानानि॥30॥आनयन-प्रेष्यप्रयोग-शब्द-रूपा-नुपात-पुद्गल-क्षेपा:॥ 31॥ कन्दर्प-कौत्कुच्य-मौखर्या-समी-क्ष्याधिकरणोपभोग-परिभोगा-नर्थक्यानि॥32॥ योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि॥33॥ अप्रत्यवेक्षिता -प्रमार्जितोत्सर्गादान-संस्तरोपक्रमणा-नादर-स्मृत्यनुप-स्थानानि॥34॥ सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषव-दु:पक्वाहारा:॥35॥ सचित्तनिक्षेपापिधान-परव्यपदेश-मात्सर्य-कालातिक्रमा:॥ 36॥ जीवित-मरणाशंसामित्रा-नुराग-सुखानुबन्धनिदानानि॥37॥ अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम्॥ 38॥ विधिद्रव्यदातृ-पात्र-विशेषात्तद्विशेष:॥ 39॥

इति तत्त्वार्थसूत्रे सप्तमोऽध्याय:॥ ७॥



अष्टम अध्याय

मिथ्या-दर्शना-विरति-प्रमाद-कषाय-योगा बन्ध-हेतव: ॥1॥ सकषायत्वाज्जीव: कर्मणो योग्यान् पुद्गला-नादत्ते स बन्ध:॥ 2॥ प्रकृति-स्थित्यनुभव-प्रदेशास् तद्विधय:॥ 3॥ आद्यो ज्ञान-दर्शना-वरण-वेदनीय-मोहनी-यायु-र्नाम-गोत्रान्तराया:॥ 4॥ पञ्च-नव-द्व्यष्टा-विंशति-चतुद्र्वि-चत्वारिंशद्-द्वि-पञ्च-भेदा यथाक्रमम्॥ 5॥ मति-श्रुत

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